श्री पार्श्वनाथ भगवान की आरती
तेईसवें तीर्थंकर
- चिह्न सर्प
- वर्ण हरित
- जन्मभूमि वाराणसी
- माता-पिता वामा · अश्वसेन
- निर्वाण सम्मेदशिखर
ॐ जय पारस देवा, स्वामी जय पारस देवा।सुर-नर-मुनिजन तुम चरणन की, करते नित सेवा॥
पौष वदी ग्यारस काशी में, आनंद अति भारी।अश्वसेन वामा माता उर, लीनो अवतारी॥ॐ जय पारस देवा…
श्यामवरण नवहस्त काय, पग उरग-लखन सोहे।सुरकृत अति अनुपम पा भूषण, सबका मन मोहे॥ॐ जय पारस देवा…
जलते देख नाग-नागिन को, मंत्र नवकार दिया।हरा कमठ का मान, ज्ञान का भानु प्रकाश किया॥ॐ जय पारस देवा…
मात-पिता तुम स्वामी मेरे, आस करूँ किसकी।तुम बिन दाता और न कोई, शरण गहूँ जिसकी॥ॐ जय पारस देवा…
तुम परमातम, तुम अध्यातम, तुम अंतरयामी।स्वर्ग-मोक्ष के दाता तुम हो, त्रिभुवन के स्वामी॥ॐ जय पारस देवा…
दीनबंधु दुखहरण जिनेश्वर, तुम ही हो मेरे।दो शिवधाम को वास, दास हम द्वार खड़े तेरे॥ॐ जय पारस देवा…
विपद-विकार मिटाओ मन का, अर्ज सुनो दाता।सेवक द्वै कर जोड़ प्रभु के, चरणों चित लाता॥ॐ जय पारस देवा…
॥ जय जिनेन्द्र ॥