श्री अभिनंदननाथ भगवान की आरती
चौथे तीर्थंकर
- चिह्न बंदर
- वर्ण स्वर्ण
- जन्मभूमि अयोध्या
- माता-पिता सिद्धार्था · स्वयंवर
- निर्वाण सम्मेदशिखर
ॐ जय अभिनंदन स्वामी, प्रभु जय अभिनंदन स्वामी।चौथे तीर्थंकर जिनवर, तुम अंतरयामी॥
नगर अयोध्या जन्म लिया प्रभु, सब जग हरषाया।पिता स्वयंवर, माँ सिद्धार्था, मंगल दिन आया॥ॐ जय अभिनंदन स्वामी…
माघ सुदी बारस को जन्मे, सुरगण सब आए।मेरु शिखर पर न्हवन कराकर, जय-जय गुण गाए॥ॐ जय अभिनंदन स्वामी…
राज-पाट सब तृण सम त्यागा, दीक्षा व्रत धारा।पौष सुदी चौदस को प्रगटा, केवल उजियारा॥ॐ जय अभिनंदन स्वामी…
कपि का चिह्न चरण में सोहे, कंचन-सी काया।दिव्यध्वनि सुनकर भविजन ने, शिव-मारग पाया॥ॐ जय अभिनंदन स्वामी…
वैशाख सुदी छठ के दिन स्वामी, सब कर्म नशाए।गिरि सम्मेदशिखर से प्रभु जी, शिवपुर को पाए॥ॐ जय अभिनंदन स्वामी…
घृत का दीपक थाल सजाकर, आरति हम गावें।भव-भव के दुख दूर करो प्रभु, शिव-सुख हम पावें॥ॐ जय अभिनंदन स्वामी…
॥ जय जिनेन्द्र ॥